राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष और ‘पंच परिवर्तन’ की अवधारणा
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना वर्ष 1925 में विजयादशमी के दिन डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार द्वारा की गई थी। एक शताब्दी की इस यात्रा में आरएसएस ने भारतीय समाज के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति और प्रभाव दर्ज कराया है। संगठन का मूल उद्देश्य राष्ट्रनिर्माण के लिए चरित्रवान, अनुशासित और राष्ट्रभक्त नागरिकों का निर्माण रहा है। वर्ष 2025 में आरएसएस अपने 100 वर्ष पूर्ण कर रहा है, जिसे संगठन आत्ममंथन, सामाजिक संवाद और भविष्य की दिशा तय करने के अवसर के रूप में देखता है।
आरएसएस की कार्यपद्धति का केंद्र ‘शाखा’ रही है, जहाँ स्वयंसेवक शारीरिक, बौद्धिक और नैतिक प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। समय के साथ संगठन ने शिक्षा, सेवा, स्वास्थ्य, श्रम, वनवासी कल्याण, ग्रामीण विकास और आपदा प्रबंधन जैसे अनेक क्षेत्रों में सहयोगी संगठनों के माध्यम से कार्य किया। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर स्वतंत्र भारत के सामाजिक जीवन तक, आरएसएस ने स्वयं को एक सांस्कृतिक-राष्ट्रीय संगठन के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है।
शताब्दी वर्ष का महत्व
100 वर्ष का कालखंड किसी भी संगठन के लिए केवल उपलब्धियों की गणना का अवसर नहीं होता, बल्कि यह बदलते समय के साथ अपने दायित्वों और प्राथमिकताओं को समझने का भी समय होता है। भारतीय समाज आज जिन चुनौतियों से गुजर रहा है, उनमें सामाजिक समरसता, पर्यावरण संतुलन, नागरिक कर्तव्यबोध और पारिवारिक-सामाजिक मूल्यों का प्रश्न प्रमुख है। इन्हीं संदर्भों में आरएसएस ने अपने शताब्दी वर्ष के विमर्श में ‘पंच परिवर्तन’ की अवधारणा को सामने रखा है।
पंच परिवर्तन: समाज के लिए पाँच दिशाएँ
‘पंच परिवर्तन’ का आशय समाज में सकारात्मक और दीर्घकालिक बदलाव के लिए पाँच प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना है। यह अवधारणा व्यक्ति से समाज तक परिवर्तन की प्रक्रिया को रेखांकित करती है।
1.सामाजिक समरसता
भारतीय समाज की विविधता उसकी शक्ति रही है, किंतु सामाजिक भेदभाव आज भी एक चुनौती है। पंच परिवर्तन का पहला बिंदु जाति, वर्ग और क्षेत्रीय भेद से ऊपर उठकर सामाजिक समरसता को मजबूत करना है, ताकि सभी वर्गों को समान सम्मान और अवसर मिल सकें।
2. कुटुंब प्रबोधन (पारिवारिक चेतना)
परिवार भारतीय संस्कृति की मूल इकाई है। आधुनिक जीवनशैली में पारिवारिक संवाद और मूल्य कमजोर पड़ते दिखाई देते हैं। कुटुंब प्रबोधन का उद्देश्य परिवारों में संवाद, संस्कार और सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना को पुनर्जीवित करना है।
3. पर्यावरण संरक्षण
पर्यावरण संकट वैश्विक चिंता का विषय है। पंच परिवर्तन में प्रकृति के साथ संतुलन, संसाधनों का संयमित उपयोग, जल-संरक्षण और स्वच्छता जैसे विषयों पर नागरिक सहभागिता को महत्वपूर्ण माना गया है।
4. स्वदेशी और आत्मनिर्भरता
आर्थिक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को सामाजिक चेतना से जोड़ते हुए स्वदेशी उत्पादों और स्थानीय संसाधनों के उपयोग पर बल दिया गया है। इसका उद्देश्य केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास को भी सुदृढ़ करना है।
5. नागरिक कर्तव्यबोध
अधिकारों के साथ कर्तव्यों की भावना लोकतंत्र की आधारशिला है। कानून का पालन, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा और सामाजिक अनुशासन को पंच परिवर्तन का अहम स्तंभ माना गया है।
भविष्य की ओर दृष्टि
आरएसएस के 100 वर्ष और पंच परिवर्तन की चर्चा केवल संगठन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज के व्यापक विमर्श से जुड़ी हुई है। यह अवधारणा इस बात पर बल देती है कि राष्ट्रनिर्माण केवल नीतियों या संस्थाओं से नहीं, बल्कि नागरिकों के आचरण और सामूहिक प्रयास से होता है। आने वाले वर्षों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पंच परिवर्तन के विचार किस प्रकार समाज के विभिन्न वर्गों में संवाद और व्यवहारिक पहल के रूप में आगे बढ़ते हैं।
इस प्रकार, आरएसएस की शताब्दी और पंच परिवर्तन भारतीय समाज के लिए आत्मावलोकन और सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ने का एक अवसर प्रस्तुत करते हैं।
